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यहूदीः जिनसे आज भी कांपते हैं दुश्मन

– नया नहीं है इजरायल-फिलिस्तीन और हमास का विवाद
इजरायल और हमास के बीच का यह विवाद नया नहीं है। फिलवक्त इजरायल ने हमास पर युद्ध का ऐलान कर दिया है। सीमावर्ती इलाकों पर लोगों को घरों में रहने की चेतावनी जारी की गई है। हमसा का हमला मुख्य बात नहीं है, इस समय चर्चा का मुख्य विषय़ यह है कि इजरायल ने युद्ध का ऐलान कर दिया है। और पूरी दुनिया इस बात को जानती है कि जब इजरायल अपने दुश्मनों के खिलाफ युद्ध का ऐलान करता है तो उसे जड़ से खत्म कर देता है।
इजरायल का साधारण नियम है चाहे जैसे हो इजरायल के दुश्मनों को इस धरती से खत्म करना। जर्मनी में हुए ओलंपिक के दौरान जब यहूदियों की हत्या की गई थी, उसके बाद कई सालों तक इजरायल की खुफिया एजेंसी उन आतंकियों को ढूंढ-ढूंढकर मारती रही।

थोड़ा समझिए इजरायल के बनने की कहानी भी
हम आपको बता दें कि इजरायल एक दिन में नहीं बना। बुद्धि, ज्ञान, संपदा और संस्कृति से भरपूर यहूदियों ने चाहे कितनी भी सफलता और सम्मान दुनिया में आज हासिल कर ली हो, लेकिन एक समय था जब उनकी यह सफलता उनके लिए काम नहीं आई। दुनियाभर में यहूदियों को जूतों की नोक पर रखा गया। उनके साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार किया गया। जर्मनी ने हिटलर द्वारा उन्हें लाखों की संख्या में मार दिया गया। उन्होंने लूट, प्रताड़ना, हत्या, बलात्कार, मजदूरी जैसे कई प्रताड़नाओं को झेला। लेकिन अंतिम बार उनके साथ बुरा व्यवहार जर्मनी में हिटलर ने ही किया। क्योंकि इसके बाद जब इजरायल बना तो उसका एक ही मकसद था- इजरायल सबसे आगे होना चाहिए। इजरायल के दुश्मनों का खात्मा, दुनिया का हर यहूदी इजरायल का नागरिक है, चाहे उसके पास इजरायल की नागरिकता हो या नहीं।

यहूदियों के लिए बेहद खास है 14 मई 1948 की तारीख
अगर हम विश्व के इतिहास पर नज डालें तो पता चलता है कि जब द्वितीय विश्वयुद्ध खत्म हुआ, तब दुनिया के सामन यहूदियों के साथ हुए दुर्व्यवहार की पूरी कहानी सामने आई। यह आंकड़े भी सामने आने लगे कि हिटलर ने कई लाख यहूदियों के मरवा दिया है। हालांकि अब यहूदियों के लिए नए देश की मांग शुरू हुई। 14 मई 1948 यह तारीख यहूदियों के लिए बेहद खास है। इस दिन दुनिया को नया देश मिला, जिसका नाम इजरायल रखा गया। इजरायल की आबादी एक करोड़ से भी कम है लेकिन इजरायल के वैज्ञानिक, इजरायल के मशीन, इजरायल की टेक्नोलॉजी समेत इजरायल से संबंधित हर चीज आज विश्वभर में प्रसिद्ध है।
बता दें कि इजरायल जब बना तो उसके पांच पड़ोसी देशों ने जो कि इस्लामिक राष्ट्र थे, उन्होंने 1967 में एक साथ मिलकर इजरायल पर हमला कर दिया था। इजरायल ने इसका कड़ा जवाब देते हुए सभी को युद्ध में एक साथ हरा दिया। इस युद्ध को ‘6 DAY WAR’ के नाम से भी जाना जाता है। इससे दुनिया में संदेश गया कि अपने दुश्मन देशों से घिरा इजरायल आकार में छोटा है लेकिन उसके हौसले किसी से कम नहीं हैं। इस युद्ध का नतीजा हुआ कि इजरायल ने सिनाई प्रायद्वीप, गाजा, पूर्वी यरुशलम, पश्चिमी तट और गोलाना की पहाड़ी पर अपना कब्जा जमा लिया।

इजरायल-फिलिस्तीन और हमास के विवाद की कहानी
हमास फिलिस्तीन का एक इस्लामिक चरमपंथी संगठन है। इसी के कारण इजरायल और फिलिस्तीन के बीच युद्ध की शुरुआत हो चुकी है। हमास ने ही 7 अक्टूबर की सुबह इजरायल पर 5000 रॉकेट दागे और इजरायल में घुसपैठ कर इजरायल के नागरिकों पर हमले किए। हालांकि अब इजरायल ने हमास के खिलाफ ऑपरेशन ऑयरन स्वॉर्ड शुरू कर कर दिया है। बता दें कि साल 1987 में हुए जनआंदोलन में शेख अहम यासीन ने हमास संगठन की नींव रखी थी। तब से हमास फिलिस्तीनी इलाकों से इजरायल को हटाने के लिए लड़ाई लड़ रहा है। हमास को गाजा पट्टी से ऑपरेट किया जाता है। इजरायल को बतौर देश हमास मान्यता नहीं देता है और इस पूरे इलाके में एक इस्लामी राष्ट्र की स्थापना करना चाहता है।

हमास का मकसद
अपनी स्थापना के एक साल बाद साल 1988 में हमास ने एक चार्टर जारी किया। इजरायल और यहूदियों को लेकर हमास ने अपने चार्टर में कहा कि यहूदी समुदाय और इजरायल को पूरी तरह खत्म करके ही दम लेगा। बता दें कि हमास दो भागों विभाजित है, जिसका एक भाग का दबदबा वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी पर है। वहीं दूसरे भाग को साल 2000 में शुरू किया गया। इसकी शुरुआत के साथ ही इजरायल पर होने वाले हमलों में बढ़ोत्तरी देखी गई। इसकी शुरुआत के साथ ही आत्मघाती हमले भी बढ़े हैं।

हमास के लड़ाके और हथियार
हमास के पास लड़ाकों की संख्या की अगर बात करें तो कई रिपोर्ट्स के मुताबिक हमास के पास करीब 50 हजार लड़ाकों की फौज है। इस ग्रुप में नौजवानों की संख्या काफी अधिक है। हमास की संख्या भले ही इजरायल की सेना से कम हो या हमास इजरायल के आगे कमजोर दिखता हो, लेकिन हमास के पास हथियारों का अच्छा-खासा जखीरा है। कई रिपोर्ट्स के मुताबिक और आए दिनों होने वाले हमलों पर ध्यान दें तो उससे पता चलता है कि हमास के पास रॉकेट से लेकर मोर्टार और ड्रोन जैसे कई हथियार है। साथ ही हमास की एक एलीट यूनिट को कोर्नेट गाइडेड एंटी टैंक मिसाइल का इस्तेमा करते हुए भी देखा गया है। इजरायल खुद कई बाद ये दावा कर चुका है कि हमास के पास कास्सम और कुद्स 101 मिसाइलों का जखीरा है।

इजरायल और हमास के बीच जंग का कारण
यह पहली बार नहीं है जब हमास ने या किसी फिलिस्तीनी चरमपंथी द्वारा इजरायल पर हमला किया गया है। इससे पहले साल 2021 में भी दोनों के बीच में युद्ध देखने को मिला था। दरअसल इजरायल की स्थापना के बाद से ही इस विवाद की कहानी शुरू होती है। इजरायल मिडिल ईस्ट में इकलौता यहूदी देश है। इसके पूर्वी हिस्से में वैस्ट बैंक मौजूद है, जहां ‘फिलीस्तीन नेशनल अथॉरिटी’ फिलीस्तीनियों के लिए सरकार चलाती है। इसे संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता मिली हुई है। इजरायल और फिलिस्तीन का विवाद 100 साल से भी अधिक पुराना है। पहले विश्वयुद्ध में जब ऑटोमन साम्राज्य हारा तो फिलिस्तीन वाले हिस्से को ब्रिटेन ने अपने कब्जे में ले लिया। उस वक्त इजरायल नहीं था। लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यहूदियों के लिए अलग देश की मांग होने लगी। इस दौरान संयुक्त राष्ट्र द्वारा यहूदियों के मिडिल ईस्ट का वो स्थान दिया गया जहां इस्लाम, इसाईयों और यहूदियों को पवित्र स्थल यरूशलम बसा हुआ है।
दरअसल यहूदियों के आने से पूर्व इस इलाके में अल्पसंख्यक यहूदी और बहुसंख्यक अरब रहा करते थे। फिलिस्तीनी यहां के रहने वाले अरब थे, लेकिन यहूदी बाहर से आए थे। फिलिस्तीनियों और यहूदियों के बीच विवाद तबह शुरू हुआ जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने ब्रिटेन को हा कि वह यहूदी लोगों के लिए फिलिस्तीन को एक राष्ट्रीय घर के तौर पर स्थापित करे। यहूदी इस भूमि को अपने पूर्वजों का मानते थे। जबकि फिलिस्तीन अरब यहां फिलिस्तीन नाम का देश चाहते थे। अरब देशों द्वारा ब्रिटेन के इस फैसले का विरोध भी किया गया। बस यहीं से इजरायल और फिलिस्तीन का विवाद शुरू हो गया।
साल 1948 में जब यहूदी नेताओं ने इजरायल को स्वतंत्र घोषित किया और इजरायल के निर्माण का ऐलान किया तो फिलिस्तीनी अरबियों द्वारा इसका विरोध किया गया और युद्ध की शुरुआत हो गई। इस युद्ध में इजरायल के पास फिलिस्तीन का काफी बड़ा हिस्सा आ गया।

अल अक्सा का विवाद
येरूशलम यहूदी, इस्लाम और ईसाई धर्म को मानने वालों के लिए पवित्र शहरों में से एक है। यहां स्थित अल-अक्सा मस्जिद को मक्का मदीना के बाद इस्लाम में तीसरा सबसे पवित्र स्थान माना जाता है। 35 एकड़ में फैले इस परिसर को मुस्लिम अल-हरम-अल-शरीफ कहते हैं। यहूदी इसे टेंपल टाउन कहते हैं. वहीं ईसाइयों का मानना है कि यहीं ईसा मसीह को सूली पर लटकाया गया था. इसके बाद वो यहीं अवतरित हुए थे। इसी के भीतर ईसा मसीह का मकबरा है। यहूदियों का सबसे स्थल डोम ऑफ द रोक भी यहीं स्थित है। ऐसे में इस स्थान को लेकर वर्षों से यहूदियों और फिलिस्तिनियों के बीच विवाद जारी है।

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